नए शिक्षा सत्र की शुरुआत के साथ ही स्कूल शिक्षा विभाग के सभी तैयारियां पूरी होने के दावे पहले ही दिन धराशायी हो गए। दुर्ग जिले के कई सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज नहीं हो सकी, बच्चों को न तो पूरी किताबें मिलीं और न ही नए गणवेश। वहीं पानी के संकट ने मध्यान्ह भोजन व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

इस सत्र से शिक्षकों की ऑनलाइन उपस्थिति अनिवार्य करने के लिए शुरू किया गया वीएसके ऐप पहले ही दिन फेल साबित हुआ। सुबह समय पर स्कूल पहुंचने वाले शिक्षक मोबाइल हाथ में लेकर नेटवर्क और सर्वर के भरोसे बैठे रहे, लेकिन घंटों कोशिश के बाद भी उपस्थिति दर्ज नहीं हो सकी। संकुल अंजोरा (ख), निकुम, बासिन, पाहंदा, उमरपोटी और रसमड़ा सहित कई क्षेत्रों के शिक्षकों की उपस्थिति दर्ज नहीं होने की जानकारी सामने आई है। शिक्षकों का कहना है कि यदि तकनीकी व्यवस्था मजबूत नहीं है तो ऑनलाइन उपस्थिति को अनिवार्य बनाना व्यावहारिक नहीं है।

नए गणवेश का वादा, पुराने कपड़ों में पहुंचे बच्चे
शिक्षा विभाग ने दावा किया था कि स्कूल खुलने से पहले बच्चों को नए रंग और डिजाइन के गणवेश उपलब्ध करा दिए जाएंगे। लेकिन अधिकांश स्कूलों में गणवेश अब तक नहीं पहुंचे हैं। नतीजतन बच्चे पुराने यूनिफॉर्म या सामान्य कपड़ों में ही स्कूल पहुंचे।
आधी-अधूरी किताबों के सहारे पढ़ाई
निःशुल्क पाठ्यपुस्तकों की आपूर्ति भी अधूरी रही। कई स्कूलों में कुछ विषयों की किताबें नहीं पहुंचीं, जबकि जहां किताबें पहुंचीं भी हैं, वहां तकनीकी कारणों से उनका वितरण नहीं हो पा रहा है। नियमों के अनुसार वितरण से पहले किताबों की स्कैनिंग जरूरी है, लेकिन ऐप में आबंटन प्रदर्शित नहीं होने से स्कैनिंग प्रक्रिया अटक गई है। परिणामस्वरूप कई छात्र पहले दिन बिना किताबों के ही कक्षाओं में बैठे नजर आए।

पानी के बिना कैसे बनेगा मध्यान्ह भोजन?
ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में सबसे गंभीर समस्या पेयजल और मध्यान्ह भोजन की रही। लगातार गिरते भूजल स्तर के कारण कई स्कूलों के बोरवेल सूख चुके हैं। ऐसे में भोजन पकाने से लेकर बर्तनों की सफाई तक की व्यवस्था प्रभावित हो रही है। शिक्षकों और स्कूल प्रबंधन समितियों का कहना है कि पानी की स्थायी व्यवस्था के बिना मध्यान्ह भोजन संचालन मुश्किल होता जा रहा है।
अव्यवस्थाओं ने खड़े किए बड़े सवाल
नए शिक्षा सत्र के पहले दिन सामने आई इन अव्यवस्थाओं ने शिक्षा विभाग की तैयारियों और प्रशासनिक दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना यह होगा कि विभाग इन समस्याओं का समाधान कितनी जल्दी कर पाता है, क्योंकि इसकी कीमत सीधे बच्चों की पढ़ाई और सुरक्षा को चुकानी पड़ रही है।
