साइबर अपराध के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के तहत दुर्ग पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए साइबर ठगी की रकम को बैंक खातों के जरिए इधर-उधर करने वाले 15 आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस जांच में सामने आया है कि आरोपी अपने बैंक खातों का इस्तेमाल तथाकथित ‘म्यूल अकाउंट’ के रूप में कर रहे थे, जिनमें देशभर में हुई साइबर ठगी की रकम जमा कराई जाती थी और बाद में उसे विभिन्न खातों में ट्रांसफर किया जाता था।

गृह मंत्रालय के पोर्टल से मिला सुराग
पुलिस के अनुसार भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा संचालित समन्वय पोर्टल पर प्राप्त शिकायतों और बैंकिंग जानकारी के आधार पर जांच शुरू की गई थी। जांच में कोटक महिंद्रा बैंक के कई खातों में संदिग्ध लेन-देन सामने आए। पड़ताल में पाया गया कि वर्ष 2024 से 2026 के बीच इन खातों में साइबर ठगी से प्राप्त रकम जमा की गई और खाताधारकों ने कमीशन या आर्थिक लाभ के लिए उन पैसों को अन्य खातों में स्थानांतरित किया।
युवा सबसे ज्यादा शामिल
गिरफ्तार आरोपियों में अधिकांश 19 से 30 वर्ष आयु वर्ग के युवक-युवतियां हैं। पुलिस के मुताबिक कई आरोपियों ने अपने बैंक खाते दूसरों को उपलब्ध कराए थे, जबकि कुछ स्वयं ट्रांजेक्शन प्रक्रिया में शामिल थे। गिरफ्तार आरोपियों में दुर्ग, भिलाई, रिसाली, जामुल और वैशाली नगर क्षेत्र के निवासी शामिल हैं।

क्या होता है म्यूल अकाउंट?
साइबर अपराधों में अपराधी अक्सर ऐसे बैंक खातों का उपयोग करते हैं जो उनके नाम पर नहीं होते। इन खातों में ठगी की रकम जमा कर उसे तेजी से दूसरे खातों में भेज दिया जाता है ताकि असली अपराधियों तक पहुंचना मुश्किल हो जाए। ऐसे खातों को ही म्यूल अकाउंट कहा जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार कई लोग थोड़े से कमीशन के लालच में अपना बैंक खाता, एटीएम कार्ड या इंटरनेट बैंकिंग सुविधा दूसरों को सौंप देते हैं और बाद में खुद भी अपराध के दायरे में आ जाते हैं।

बैंक खाते देना पड़ सकता है भारी
दुर्ग पुलिस ने नागरिकों को चेतावनी दी है कि किसी भी व्यक्ति को अपना बैंक खाता, एटीएम कार्ड, पासबुक, मोबाइल नंबर या इंटरनेट बैंकिंग सुविधा उपयोग के लिए उपलब्ध न कराएं। यदि किसी खाते का उपयोग साइबर अपराध में होता है तो खाताधारक के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
पुलिस कर रही ट्रांजेक्शन की गहराई से जांच
पुलिस ने बैंक खातों से जुड़े दस्तावेज, वित्तीय लेन-देन के रिकॉर्ड और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जब्त किए हैं। अब जांच यह पता लगाने के लिए आगे बढ़ाई जा रही है कि साइबर ठगी का मूल नेटवर्क कहां से संचालित हो रहा था और इन खातों के जरिए कितनी रकम का लेन-देन हुआ।
