प्रदेश में शिक्षक विहीन स्कूलों की समस्या दूर करने के लिए सरकार ने जिस युक्तियुक्तकरण अभियान को बड़े सुधार के तौर पर लागू किया था, उसी प्रक्रिया में दुर्ग जिले से वित्तीय अनियमितता का बड़ा मामला सामने आया है। संयुक्त संचालक के आदेश से राजनांदगांव जिले में स्थानांतरित की गई एक शिक्षिका को न केवल समय पर कार्यमुक्त नहीं किया गया, बल्कि उन्हें अंतिम वेतन प्रमाण पत्र (एलपीसी) भी जारी नहीं किया गया। इसके बावजूद करीब एक साल तक दुर्ग जिले से ही उनका वेतन आहरित होता रहा। मामले का खुलासा होने के बाद जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) ने इसे गंभीर वित्तीय अनियमितता और कदाचार मानते हुए विकासखंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) को कारण बताओ नोटिस जारी किया है।

राज्य शासन ने पिछले वर्ष मई-जून में शिक्षक विहीन स्कूलों में शिक्षकों की कमी दूर करने के लिए युक्तियुक्तकरण की प्रक्रिया शुरू की थी। दुर्ग जिले में 2 और 5 जून को अतिशेष शिक्षकों की काउंसलिंग कराई गई थी। इसके बाद 7 जून को संयुक्त संचालक, दुर्ग संभाग ने स्थानांतरण आदेश जारी किए। इसी आदेश के तहत शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला शांति नगर, भिलाई में पदस्थ विज्ञान ई संवर्ग की शिक्षिका मेनका साहू का स्थानांतरण शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला हरदी, विकासखंड डोंगरगांव (जिला राजनांदगांव) किया गया था। आदेश में स्पष्ट रूप से तीन दिन के भीतर कार्यमुक्त करने के निर्देश दिए गए थे।

नई जगह ज्वाइन नहीं किया, पुरानी जगह से वेतन
नियमों के अनुसार स्थानांतरण के बाद संबंधित कर्मचारी को कार्यमुक्त कर अंतिम वेतन प्रमाण पत्र (एलपीसी) जारी किया जाता है, ताकि नए जिले में कार्यभार ग्रहण करने के बाद वहीं से वेतन भुगतान शुरू हो सके। लेकिन इस मामले में न तो शिक्षिका ने डोंगरगांव स्थित नई संस्था में कार्यभार ग्रहण किया और न ही दुर्ग के अधिकारियों ने एलपीसी जारी की। इसके बावजूद उन्हें करीब एक वर्ष तक दुर्ग जिले से नियमित वेतन का भुगतान होता रहा।
संरक्षण देकर कराया गया वेतन भुगतान
पूरा मामला उच्च अधिकारियों तक पहुंचने के बाद जिला शिक्षा अधिकारी ने 15 जून को विकासखंड शिक्षा अधिकारी को कारण बताओ नोटिस जारी किया। नोटिस में स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि संबंधित कर्मचारी को संरक्षण देते हुए नियमित वेतन आहरित कर भुगतान किया गया। साथ ही एलपीसी जारी नहीं करना तथा नियमों के विपरीत वेतन जारी रखना वित्तीय अनियमितता, कूटरचना कर अनुचित लाभ पहुंचाने तथा कदाचार की श्रेणी में आता है।

एक अधिकारी नहीं, नेटवर्क का कमाल
शिक्षा विभाग के जानकारों का कहना है कि यह पूरा मामला केवल एक अधिकारी की लापरवाही नहीं हो सकता। किसी कर्मचारी का स्थानांतरण होने के बाद भी महीनों तक पुराने जिले से वेतन निकलना कई स्तरों पर निगरानी की विफलता या फिर मिलीभगत की ओर संकेत करता है। वेतन आहरण प्रक्रिया में आहरण एवं संवितरण अधिकारी, बीईओ कार्यालय तथा लेखा शाखा सहित कई स्तरों से भुगतान की प्रक्रिया गुजरती है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि बिना एलपीसी और बिना नई पदस्थापना में ज्वाइनिंग के वेतन भुगतान आखिर किस आधार पर होता रहा?
अब इन सवालों के जवाब बाकी
तीन दिन में कार्यमुक्त करने के आदेश का पालन क्यों नहीं हुआ?
शिक्षिका ने नई पदस्थापना में ज्वाइन क्यों नहीं किया?
एलपीसी आखिर क्यों रोकी गई?
बिना ज्वाइनिंग के एक साल तक वेतन किसके आदेश से जारी होता रहा?
इस पूरी प्रक्रिया में जिम्मेदार अधिकारी कौन-कौन हैं?
क्या केवल नोटिस देकर मामला खत्म होगा या विभागीय और आपराधिक जांच भी होगी?

जिम्मेदारों पर बड़ी कार्रवाई की आहट
सूत्रों के अनुसार यदि बीईओ का जवाब संतोषजनक नहीं पाया गया तो विभाग इस मामले में विस्तृत जांच बैठा सकता है। जांच का दायरा बढ़ने पर वेतन भुगतान से जुड़े कई अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी सामने आ सकती है। शिक्षा विभाग के भीतर इस मामले को युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया से जुड़ी अब तक की सबसे गंभीर वित्तीय अनियमितताओं में से एक माना जा रहा है।
