दुर्ग जिले के शिक्षा विभाग में स्थानांतरण प्रक्रिया और वेतन आहरण से जुड़ी कथित अनियमितताओं की जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद भी कार्रवाई आगे नहीं बढ़ने का मामला अब सवालों के घेरे में है। विकासखंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) की ओर से जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) को सौंपी गई जांच रिपोर्ट में प्रक्रिया से जुड़ी कई गड़बड़ियों का उल्लेख किए जाने के बावजूद अब तक जिम्मेदारों पर कार्रवाई और कथित रूप से अधिक आहरित वेतन की वसूली को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है। इससे विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।

मामला शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला शांतिनगर, भिलाई की शिक्षिका मेनका साहू के युक्तियुक्तकरण के तहत डोंगरगांव, राजनांदगांव स्थानांतरण से जुड़ा बताया जा रहा है। जांच के दौरान तत्कालीन प्रभारी लिपिक अभिषेक यादव ने अपने लिखित बयान में कहा कि वे संबंधित प्रभार में नहीं थे। हालांकि, बीईओ की जांच रिपोर्ट में स्थापना संबंधी कार्य और एलपीसी (अंतिम वेतन प्रमाण पत्र) जारी करने की जिम्मेदारी उनके द्वारा संपादित किए जाने का उल्लेख किया गया है।
जांच रिपोर्ट में दर्ज तथ्यों के अनुसार, इस मामले में संबंधित कर्मचारी के बयान और कार्यालयीन रिकॉर्ड के बीच विरोधाभास की स्थिति सामने आई। इसके बावजूद संबंधित कर्मचारी के खिलाफ अब तक किसी दंडात्मक कार्रवाई की जानकारी सामने नहीं आई है।

बिना एलपीसी वेतन आहरण पर भी सवाल
नियमों के अनुसार स्थानांतरण के बाद संबंधित कर्मचारी का एलपीसी जारी कर उसे नई पदस्थापना के लिए कार्यमुक्त किया जाता है। लेकिन जांच से जुड़े तथ्यों के मुताबिक, स्थानांतरण आदेश के बावजूद शिक्षिका करीब एक वर्ष तक पुरानी शाला में कार्यरत रहीं और उनका वेतन बीईओ कार्यालय के माध्यम से आहरित होता रहा।
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि स्थानांतरण के बाद एलपीसी जारी नहीं हुई थी, तो वेतन आहरण किस आधार पर किया गया। जांच रिपोर्ट में इस प्रक्रिया से जुड़े तथ्यों का उल्लेख होने के बावजूद आहरण-संवितरण अधिकारी या संबंधित जिम्मेदारों पर कार्रवाई और कथित अतिरिक्त वेतन की रिकवरी को लेकर अब तक कोई स्पष्ट निर्णय सामने नहीं आया है।

11 दिन में दो अलग-अलग आदेशों ने बढ़ाया विवाद
मामले में जांच रिपोर्ट के आधार पर सामने आया एक और महत्वपूर्ण पहलू विभागीय आदेशों से जुड़ा है। तत्कालीन बीईओ राजेश्वरी चंद्राकर के बयान के अनुसार, बीईओ कार्यालय दुर्ग की ओर से 9 जून 2025 को शिक्षिका को कार्यमुक्त करने का आदेश जारी किया गया था। इसके महज 11 दिन बाद, 20 जून 2025 को डीईओ कार्यालय की ओर से उसी शाला में पुन: उपस्थिति देने संबंधी निर्देश जारी किए जाने का उल्लेख जांच में किया गया है।
एक ही कर्मचारी के संबंध में कम समय के अंतराल में जारी इन दोनों आदेशों को लेकर विभागीय स्तर पर सवाल उठ रहे हैं। अब यह भी चर्चा का विषय है कि दोनों आदेश किन परिस्थितियों में जारी किए गए और इनके आधार पर वेतन आहरण एवं पदस्थापना की प्रक्रिया कैसे संचालित हुई।

जांच के बाद भी कार्रवाई का इंतजार
पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि जब जांच रिपोर्ट में प्रक्रिया संबंधी गड़बड़ियों का उल्लेख हो चुका है, तो इसके बाद जिम्मेदारी तय करने की कार्रवाई अब तक क्यों नहीं हुई। क्या विभाग दोषी पाए जाने वाले कर्मचारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करेगा? क्या कथित रूप से नियम विरुद्ध आहरित राशि की वसूली होगी? और 9 जून तथा 20 जून को जारी दोनों आदेशों की जिम्मेदारी किस स्तर पर तय की जाएगी?
इन सवालों का जवाब अब विभागीय कार्रवाई पर निर्भर है। फिलहाल जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद भी कार्रवाई नहीं होने से शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। मामले में विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आने के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।
