दुर्ग। जुनवानी भूमि प्रकरण में न्यायालय के आदेश पर सुपेला पुलिस ने उद्योगपति पति पत्नी के खिलाफ अपराध दर्ज कर जांच में लिया है। सुपेला पुलिस ने बताया प्रकरण में शिकायतकर्ता सुनील कुमार सोमन द्वारा लंबे समय से न्याय के लिए किए जा रहे प्रयासों के पश्चात अंततः माननीय न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा। न्यायालय द्वारा स्पष्ट आदेश दिए जाने के बाद सुपेला थाने में सिंपलेक्स कास्टिंग्स लिमिटेड के मालिक केतन शाह एवं उनकी पत्नी संगीता केतन शाह के खिलाफ धारा 120 B, 406,416,420,467,468,471,34 के आवेदन पर आईपीसी के तहत जुर्म दर्ज किया है।
न्यायालय का आदेश न हो, तब तक क्या ऐसे मामलों में पुलिस कार्रवाई संभव नहीं हों पाती है।

भूमि सौदा, भुगतान और रजिस्ट्री से इंकार
शिकायतकर्ता के अनुसार, भूमि विवादित होने एवं न्यायालय में प्रकरण होने के बावजूद तथ्यों को छुपाते हुए जुनवानी स्थित भूमि का विधिवत एग्रीमेंट किया गया एवं भुगतान भी किया गया, इसके बावजूद रजिस्ट्री नहीं की गई। लगातार निवेदन के बाद भी टालमटोल किया जाता रहा। आरोप है कि एक ही संपत्ति के संबंध में वित्तीय संस्था से ऋण लेकर दोहरी आर्थिक गतिविधि की गई, जिससे 4,60,000,00/- की गंभीर आर्थिक क्षति हुई।

पुलगांव प्रकरण—पहले भी सामने आ चुका है समान मामला
यह पहला मामला नहीं बताया जा रहा है। शिकायतकर्ता के अनुसार, विशाल केजरीवाल द्वारा पुलगांव थाना में 07 अप्रैल 2025 को अपराध क्रमांक 109/25, धारा 420 IPC के अंतर्गत मामला दर्ज कराया गया था। उस प्रकरण में भी एग्रीमेंट एवं भुगतान के बावजूद रजिस्ट्री न करने के आरोप सामने आए थे।

अग्रिम जमानत पर है आरोपियां
जानकारी के अनुसार, पुलगांव मामले में संगीता केतन शाह अग्रिम जमानत पर हैं, जिसमें यह शर्त है कि वे इस प्रकार के विवादित कार्यों में संलिप्त नहीं होंगी। उसके बावजूद आरोपियों ने समान प्रवृत्ति का अपराध किया.

मुंबई संपत्ति प्रकरण—FIR के बजाय 155 CrPC
आरोप है कि विशाल केजरीवाल से मुंबई स्थित एक संपत्ति के नाम पर भी धनराशि ली गई। इस मामले में कथित रूप से थाना स्तर पर FIR दर्ज न कर धारा 155 CrPC के तहत रिपोर्ट दर्ज कर न्यायालय जाने की सलाह दी गई, जिससे कार्रवाई पर और भी प्रश्न खड़े होते हैं।
लगातार दोहराया जा रहा एक ही पैटर्न
एक के बाद एक मामलों में सामने आ रहे आरोपों को देखते हुए यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या यह केवल अलग-अलग विवाद हैं या एक ही प्रकार की कार्यप्रणाली बार-बार दोहराई जा रही है।
यदि ऐसा है, तो यह केवल व्यक्तिगत विवाद न होकर व्यापक जांच का विषय बनता है।
प्रभाव, पहचान और विश्वास का उपयोग?
शिकायतकर्ता का कहना है कि संबंधित पक्ष 50 वर्षों से संचालित नामचीन कंपनी है जो स्वयं को सामाजिक एवं राजनीतिक रूप से सक्रिय एवं प्रभावशाली बताकर लोगों के बीच विश्वास स्थापित करता रहा है। आरोप है कि इसी विश्वास के आधार पर लोगों से आर्थिक लेन-देन किए गए।
कार्रवाई में देरी पर उठते सवाल
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि, जब एक से अधिक मामले सामने आ चुके हैं, न्यायालय स्वयं हस्तक्षेप कर चुका है, तो ठोस एवं त्वरित कार्रवाई होगी क्या आम नागरिक और प्रभावशाली व्यक्ति के मामलों में कार्रवाई की गति अलग-अलग होती है? शिकायतकर्ता ने बताया कि धोखाधड़ी होने पर उसने अपराध दर्ज करने थाना से लेकर मुख्यमंत्री तक गुहार लगाई थी परंतु न्याय नहीं हुआ उल्टा आरोपियों को बचाने के लिए उनके मन मनमुताबिक कार्रवाई की गई।
आरोप है कि आरोपीगण अत्यंत रसूखदार, आर्थिक रूप से सशक्त एवं सामाजिक-राजनीतिक पहुंच रखने वाले व्यक्ति हैं। शिकायतकर्ता के अनुसार, इनके प्रदेश के कई बड़े राजनीतिक व्यक्तियों से संपर्क बताए जाते हैं, जिनके नाम एवं पहचान का उपयोग कर ये प्रभाव स्थापित करने का प्रयास करते हैं। यह भी आशंका व्यक्त की गई है कि इसी प्रभाव एवं संपर्क के आधार पर आरोपीगण कार्रवाई से बचने का प्रयास कर सकते हैं तथा विभिन्न स्तरों पर सहयोग प्राप्त कर सकते हैं।