दुर्ग। शासकीय विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर शैक्षणिक वातावरण तैयार करने की दिशा में शासकीय प्राथमिक शाला चिखला, संकुल केंद्र हिर्री के प्रधान पाठक दिनेश साहू द्वारा एक प्रेरणादायक पहल की जा रही है। उन्होंने बताया कि वे विगत कई वर्षों से अपने वेतन का लगभग 15 प्रतिशत भाग स्वेच्छा से शाला विकास एवं विद्यार्थियों के हित में खर्च कर रहे हैं।

स्वयं के खर्च पर दो अतिथि शिक्षकों की व्यवस्था
प्रधान पाठक दिनेश साहू द्वारा अपनी शाला में अध्ययनरत 17 बच्चों को निःशुल्क जूते, मोजे, कॉपी, पेन एवं पहाड़ा चार्ट उपलब्ध कराया जाता है। इसके साथ ही सभी विद्यार्थियों को टाई, बेल्ट और परिचय पत्र भी निःशुल्क वितरित किए जाते हैं। शाला का शैक्षणिक स्तर बनाए रखने के लिए उन्होंने स्वयं के खर्च पर दो अतिथि शिक्षकों की व्यवस्था की है, जिन पर प्रतिमाह लगभग छह हजार रुपये व्यय किए जाते हैं।

तीन से चार दिन न्यौता भोजन का आयोजन
विद्यालय में बच्चों का जन्मदिन केक काटकर मनाने की परंपरा भी शुरू की गई है। सप्ताह में तीन से चार दिन न्यौता भोजन का आयोजन तथा राष्ट्रीय पर्वों पर ग्रामवासियों के लिए नाश्ते की व्यवस्था भी उनके सहयोग से की जाती है। दीपावली के अवसर पर सफाई कर्मी एवं रसोइया को सम्मान स्वरूप साड़ी भेंट की जाती है।

तीन से चार दिन न्यौता भोजन का आयोजन
इस वर्ष प्रवेश उत्सव के दौरान न्यौता भोजन, बच्चों के लिए जूता वितरण, अतिथि सम्मान एवं ग्रामवासियों के लिए भोजन व्यवस्था सहित लगभग 28 हजार रुपये का खर्च किया गया। वहीं पिछले वर्ष बच्चों को लगभग 10 हजार रुपये मूल्य के लोवर और टी-शर्ट वितरित किए गए थे। आगामी सत्र में विद्यालय परिसर में 10 हजार रुपये की लागत से तीन से चार दिन न्यौता भोजन का आयोजनतीन से चार दिन न्यौता भोजन का आयोजन गई है।

संकुल स्तरीय शाला प्रवेश उत्सव का दो बार आयोजन
केवल अपनी शाला ही नहीं, बल्कि संकुल की अन्य शालाओं में भी दिनेश साहू लगातार सहयोग दे रहे हैं। उन्होंने विभिन्न विद्यालयों में निःशुल्क आई-कार्ड एवं बेल्ट वितरण, स्मार्ट टीवी, कंप्यूटर सेट, फोटोकॉपी सेट, ट्यूबलाइट और सीलिंग फैन जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं। साथ ही संकुल स्तरीय शाला प्रवेश उत्सव का दो बार आयोजन कर शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया है।

विद्यालयों का शैक्षणिक स्तर उत्कृष्ट बने
दिनेश साहू का कहना है कि उनका उद्देश्य केवल इतना है कि शासकीय विद्यालयों का शैक्षणिक स्तर उत्कृष्ट बने और पालक अपने बच्चों को निजी विद्यालयों की बजाय सरकारी विद्यालयों में पढ़ाने के लिए प्रेरित हों। उनकी यह पहल शिक्षा के क्षेत्र में सामाजिक भागीदारी और समर्पण का एक प्रेरक उदाहरण बन रही है।