दुर्ग नगर निगम में नए कमिश्नर की नियुक्ति को लेकर प्रशासनिक हलकों से ज्यादा अब राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। पूर्व कमिश्नर सुमित अग्रवाल के तबादले के करीब तीन सप्ताह बाद भी स्थायी कमिश्नर की पदस्थापना नहीं होने को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि निगम की महत्वपूर्ण कमिश्नर कुर्सी पर अपनी पसंद के अधिकारी की पदस्थापना को लेकर सत्ता पक्ष से जुड़े प्रभावशाली नेताओं के बीच सहमति नहीं बन पा रही है। हालांकि, इस संबंध में किसी भी जिम्मेदार नेता की ओर से आधिकारिक तौर पर ऐसी कोई पुष्टि नहीं की गई है।

पूर्व कमिश्नर सुमित अग्रवाल का 9 जुलाई को रायपुर तबादला होने के बाद 13 जुलाई को उपायुक्त मोहेंद्र साहू को निगम कमिश्नर का प्रभार सौंपा गया था। इसके बाद से निगम प्रभारी व्यवस्था के तहत संचालित हो रहा है। स्थायी कमिश्नर की नियुक्ति में देरी अब निगम के प्रशासनिक कामकाज के साथ-साथ शहर की राजनीति में भी चर्चा का विषय बन गई है।
राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं के मुताबिक, निगम कमिश्नर की नियुक्ति को लेकर सत्ता से जुड़े अलग-अलग प्रभावशाली केंद्रों की अपनी पसंद बताई जा रही है। अब तक कई अधिकारियों के नाम संभावित दावेदार के रूप में चर्चा में आने की बात कही जा रही है। हालांकि, इनमें से किसी नाम की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
दुर्ग नगर निगम की राजनीति में मंत्री गजेंद्र यादव और महापौर अल्का बाघमार के बीच राजनीतिक मतभेदों की चर्चाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं। ऐसे में कमिश्नर की नियुक्ति में हो रही देरी को भी राजनीतिक हलकों में दोनों के बीच कथित मतभेदों से जोड़कर देखा जा रहा है। चर्चा है कि दोनों पक्ष अपनी पसंद के अधिकारी को निगम की कमान सौंपे जाने के पक्ष में हो सकते हैं। हालांकि, यह राजनीतिक चर्चा है और इसकी स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

निगम का प्रशासनिक कामकाज प्रभारी व्यवस्था के भरोसे
राजनीतिक खींचतान की चर्चाओं के बीच निगम का प्रशासनिक कामकाज फिलहाल प्रभारी व्यवस्था के भरोसे है। सबसे बड़ा सवाल वित्तीय अधिकारों को लेकर बताया जा रहा है। निगम से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, प्रभारी अधिकारी के पास पूर्ण वित्तीय अधिकार नहीं होने से कुछ महत्वपूर्ण वित्तीय निर्णय और भुगतान संबंधी मामले प्रभावित हो सकते हैं।
निर्माण और विकास कार्यों से जुड़े भुगतान की कई फाइलें लंबित होने की चर्चा है। भुगतान में देरी के कारण कुछ ठेकेदारों द्वारा निर्माण एवं मेंटेनेंस कार्यों की गति धीमी किए जाने की भी जानकारी सामने आ रही है। हालांकि, कितने कार्य प्रभावित हैं और कितनी राशि का भुगतान लंबित है, इसका आधिकारिक आंकड़ा फिलहाल सामने नहीं आया है।

राजनीतिक फैसला, प्रशासनिक असर?
निगम कमिश्नर की नियुक्ति को लेकर चल रही राजनीतिक चर्चाओं के बीच इसका असर अब निगम के कामकाज पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। निगम में विकास कार्यों की स्वीकृति, भुगतान और प्रशासनिक निर्णयों के लिए स्थायी नेतृत्व की जरूरत महसूस की जा रही है।
इधर, निगम कर्मचारियों के बीच भी आगामी वेतन भुगतान को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। हालांकि, वेतन भुगतान में किसी प्रकार की वास्तविक बाधा की निगम प्रशासन ने आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। बावजूद इसके, कर्मचारियों के बीच वित्तीय अधिकारों को लेकर असमंजस की स्थिति बनी होने की बात कही जा रही है।

‘कुर्सी’ के लिए सियासत या प्रशासनिक जरूरत?
दुर्ग निगम की कमिश्नर कुर्सी को लेकर जारी राजनीतिक चर्चाओं ने अब एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या नियुक्ति में देरी महज प्रशासनिक प्रक्रिया है या इसके पीछे राजनीतिक सहमति का इंतजार है? निगम की कमिश्नर कुर्सी शहर के प्रशासनिक फैसलों और विकास कार्यों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी है कि जब तक प्रभावशाली राजनीतिक पक्षों के बीच किसी एक नाम पर सहमति नहीं बनती, तब तक नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ने में समय लग सकता है। हालांकि, शासन स्तर से नियुक्ति को लेकर कोई आधिकारिक कारण सामने नहीं आया है।
फिलहाल निगम के कर्मचारी, ठेकेदार और शहर की जनता नए कमिश्नर की नियुक्ति का इंतजार कर रही है। अब देखना यह है कि कमिश्नर की इस ‘खाली कुर्सी’ पर प्रशासनिक फैसला पहले होता है या राजनीतिक सहमति पहले बनती है।
