छत्तीसगढ़ का उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व अब सिर्फ बाघों और जैव विविधता के लिए ही नहीं, बल्कि दुर्लभ पक्षियों के स्वर्ग के रूप में भी अपनी नई पहचान बनाने जा रहा है। प्रदेश में पहली बार यहां हॉर्नबिल सफारी शुरू करने की तैयारी की जा रही है। खास बात यह है कि यह पहल केवल वन्यजीव पर्यटन तक सीमित नहीं होगी, बल्कि विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) के युवाओं के लिए रोजगार और आजीविका का नया मॉडल भी बनेगी।

वन मंत्री Kedar Kashyap की पहल पर उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व प्रबंधन ने ओढ़, अमलोर और आमामोरा गांवों में हॉर्नबिल सफारी शुरू करने का निर्णय लिया है। यह वही क्षेत्र हैं जहां पिछले कुछ वर्षों में दुर्लभ मालाबार पाइड हॉर्नबिल की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। वन विभाग के संरक्षण प्रयासों का असर अब जमीन पर दिखाई देने लगा है। एंटी-पोचिंग अभियान, अतिक्रमण हटाने, फलदार वृक्षों के संरक्षण और रोपण के साथ-साथ हॉर्नबिल रेस्टोरेंट जैसी अभिनव योजनाओं ने इस पक्षी के लिए सुरक्षित आवास तैयार किया है। परिणामस्वरूप उदंती-सीतानदी में हॉर्नबिल की आबादी लगातार बढ़ रही है। वन विभाग द्वारा गठित विशेष हॉर्नबिल ट्रैकिंग टीम लगातार इनके घोंसलों, आवास क्षेत्रों और गतिविधियों की निगरानी कर रही है। स्थानीय युवाओं की भागीदारी ने इस अभियान को और अधिक प्रभावी बनाया है।

अब जंगल दिखाएगा नया आकर्षण
प्रस्तावित हॉर्नबिल सफारी के जरिए पर्यटक, बर्ड वॉचर, वन्यजीव फोटोग्राफर और शोधकर्ता प्राकृतिक परिवेश में दुर्लभ हॉर्नबिल को नजदीक से देख सकेंगे। प्रारंभिक चरण में दो जिप्सी वाहनों के माध्यम से सफारी संचालित करने की योजना बनाई गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल उदंती-सीतानदी को मध्य भारत के प्रमुख बर्डिंग डेस्टिनेशन के रूप में स्थापित कर सकती है।
जंगल से रोजगार तक का सफर
इस परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू स्थानीय समुदायों की भागीदारी है। पीवीटीजी गांवों के युवाओं को बर्ड वॉचिंग, नेचर इंटरप्रिटेशन और पर्यटन प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रशिक्षण के बाद वे नेचर गाइड और हॉर्नबिल गाइड के रूप में कार्य करेंगे। इससे जहां युवाओं को स्थायी रोजगार मिलेगा, वहीं वन्यजीव संरक्षण के प्रति स्थानीय समुदाय की जिम्मेदारी और सहभागिता भी बढ़ेगी।

हॉर्नबिल ही नहीं, जैव विविधता का खजाना
रायपुर से लगभग 130 किलोमीटर दूर स्थित उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व पहले से ही पक्षी प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। यहां मालाबार पाइड हॉर्नबिल के अलावा शाहीन बाज, भारतीय पिट्टा, ब्राउन फिश आउल, ग्रे-हेडेड फिश ईगल, कई प्रजातियों के कठफोड़वा, बार्बेट और मिनिवेट जैसे दुर्लभ पक्षी पाए जाते हैं। इसके अलावा भारतीय विशाल गिलहरी और उड़न गिलहरी जैसे दुर्लभ वन्यजीव भी इस क्षेत्र की पहचान हैं।
संरक्षण और पर्यटन का नया मॉडल
वन विशेषज्ञों का मानना है कि उदंती-सीतानदी की यह पहल देश के लिए एक मॉडल बन सकती है, जहां वन्यजीव संरक्षण, ग्रामीण विकास और इको-टूरिज्म को एक साथ जोड़ा गया है। यदि योजना सफल रही तो छत्तीसगढ़ को प्राकृतिक पर्यटन के मानचित्र पर नई पहचान मिलेगी।

