लंबे समय से ठंडे बस्ते में पड़ी छत्तीसगढ़ की बोधघाट परियोजना को लेकर एक बार फिर विवाद गहराने लगा है। छत्तीसगढ़ संग्राम परिषद ने परियोजना को पुनर्जीवित करने के प्रयासों का विरोध करते हुए आरोप लगाया है कि यह योजना किसानों और आदिवासियों के हितों के बजाय बस्तर क्षेत्र में खनिज आधारित उद्योगों की पानी की जरूरत पूरी करने के उद्देश्य से आगे बढ़ाई जा रही है।

संगठन के अध्यक्ष Rajkumar Gupta ने कहा कि वर्ष 1970 में प्रस्तावित बोधघाट परियोजना का मूल उद्देश्य सिंचाई के लिए इंद्रावती नदी के जल का उपयोग करना था, लेकिन परियोजना से होने वाले बड़े पैमाने पर विस्थापन और डूब क्षेत्र के कारण इसका लगातार विरोध होता रहा। राजकुमार गुप्त ने कहा कि यदि परियोजना लागू होती है तो 56 गांवों की कृषि गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और लगभग 25 से 30 हजार लोगों के सामने विस्थापन का संकट खड़ा हो सकता है।
56 गांव डूब क्षेत्र में आने का दावा
संग्राम परिषद के अनुसार प्रारंभिक प्रस्ताव में 28 गांव पूर्ण रूप से और 28 गांव आंशिक रूप से डूब क्षेत्र में आते थे। संगठन का कहना है कि परियोजना से संभावित लाभ की तुलना में सामाजिक और पर्यावरणीय नुकसान अधिक थे, जिसके चलते प्रभावित आदिवासी समुदायों ने वर्षों तक इसका विरोध किया और परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी।


उद्योगों को लाभ पहुंचाने की तैयारी
परिषद ने आरोप लगाया है कि वर्तमान में बदली परिस्थितियों के बीच सरकार बोधघाट परियोजना को दोबारा शुरू करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। संगठन का दावा है कि बस्तर में खनिज आधारित उद्योगों के विस्तार को देखते हुए जल उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए इस परियोजना को फिर से सक्रिय किया जा रहा है।
आदिवासी हितों की अनदेखी का आरोप
संग्राम परिषद ने सरकार से परियोजना पर पुनर्विचार करने की मांग करते हुए कहा है कि हजारों आदिवासियों की आशंकाओं और संभावित जनहानि को नजरअंदाज कर कोई भी निर्णय नहीं लिया जाना चाहिए। संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि प्रभावित क्षेत्रों की सहमति और व्यापक जनहित को दरकिनार कर परियोजना को आगे बढ़ाया गया तो इसका विरोध और तेज किया जाएगा।

अब निगाहें सरकार के अगले कदम पर
बोधघाट परियोजना को लेकर सरकार की ओर से अभी विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन परियोजना के पुनर्जीवन की चर्चाओं के बीच विरोध और समर्थन की आवाजें तेज होने लगी हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में यह मुद्दा बस्तर की राजनीति और विकास बहस का प्रमुख केंद्र बन सकता है।
