छत्तीसगढ़ युवा कांग्रेस के संगठनात्मक चुनावों में लेटर बम के बाद अब एक ऐसा नया और चौकाने वाला एंगल सामने आया है, जिसने पूरी चुनाव प्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। कांग्रेस संगठन ने चुनाव और नामांकन की प्रक्रिया के बीच ही अपने डिजिटल इलेक्शन एप में एक ऐसा बदलाव कर दिया है, जिससे छत्तीसगढ़ की भौगोलिक और राजनैतिक सीमाओं में 90 की जगह 91 विधानसभाएं नजर आने लगी हैं! सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं और राजनीतिक गलियारों में इसे पूर्व गृह मंत्री द्वारा पूर्व में चुनाव अधिकारी समर्थ मिश्रा को लिखे के पत्र से जोड़कर देखा जा रहा है। यहां बताना लाजमी है कि संवैधानिक और राजनीतिक रूप से छत्तीसगढ़ में केवल 90 विधानसभा सीटें हैं, लेकिन यूथ कांग्रेस के नामांकन पोर्टल में कथित तौर पर रिसाली नगर को एक अलग विधानसभा के रूप में दर्ज कर दिया गया है। इस नए एप कांड ने दुर्ग से लेकर प्रदेश स्तर तक के नेताओं के होश उड़ा दिए हैं।

लेटर बम का असर या संगठन की बड़ी चूक?
इससे पहले पूर्व गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू का एक पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें उन्होंने रिसाली ब्लॉक को भिलाई में शामिल किए जाने पर आपत्ति जताते हुए इसे दुर्ग ग्रामीण में ही रखने की मांग की थी। इस पत्र के खिलाफ राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे तक शिकायत भी पहुंची थी कि चुनाव के बीच ऐसा हस्तक्षेप अनुशासनहीनता है। लेकिन अब जो नया मोड़ आया है, वह हैरान करने वाला है। आरोप लग रहे हैं कि वरिष्ठ नेताओं के इस सियासी दबाव के आगे झुकते हुए संगठन ने बीच चुनाव में रिसाली को न तो दुर्ग ग्रामीण में रहने दिया और न ही भिलाई नगर में, बल्कि इलेक्शन एप में रिसाली नगर नाम से एक नई (91वीं) विधानसभा ही खड़ी कर दी।

नामांकन के बाद बदला नियम, संकट में फंसे दावेदार
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक आपत्तिजनक और गंभीर बात यह है कि यह तकनीकी बदलाव तब किया गया, जब नामांकन की प्रक्रिया चल रही थी। पूर्व के नियमों के अनुसार, रिसाली क्षेत्र के प्रत्याशियों और मतदाताओं को भिलाई नगर या दुर्ग ग्रामीण में से किसी एक क्षेत्र को चुनने, वहां से नामांकन दाखिल करने अथवा मतदान करने का अधिकार था। इसी नियम के तहत रिसाली क्षेत्र के कई कद्दावर दावेदारों ने अपनी रणनीति के अनुसार भिलाई नगर या दुर्ग ग्रामीण से अपने पर्चे दाखिल कर दिए। अब जब बीच रास्ते में रिसाली को अलग विधानसभा बना दिया गया है, तो तकनीकी रूप से ये दावेदार न तो उस क्षेत्र के प्रत्याशी रह जाएंगे जहां उन्होंने फॉर्म भरा है, और न ही नए क्षेत्र में वोट दे पाएंगे। यदि संगठन इसी त्रुटिपूर्ण व्यवस्था को आगे बढ़ाता है, तो सबसे हास्यास्पद स्थिति यह होगी कि चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार खुद को भी वोट नहीं कर पाएंगे!

दुर्ग की राजनीति में भारी आक्रोश, दिल्ली तक गूंजने की तैयारी
इस नए मोड़ ने दुर्ग जिले की राजनीति को पूरी तरह गरमा दिया है। दावेदारों और जमीनी कार्यकर्ताओं में इस अदृश्य दबाव और एप के खिलवाड़ को लेकर भारी आक्रोश है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि राहुल गांधी के जिस ‘पारदर्शी और लोकतांत्रिक चुनाव मॉडल की कसमें खाई जाती हैं, क्या वह चंद बड़े नेताओं के दबाव में इस तरह बदल दिया जाएगा? पार्टी के भीतर ही दबी जुबान में इसे प्रबंधन और चुनावी फिक्सिंग का नाम दिया जा रहा है। कयास लगाए जा रहे हैं कि प्रभावित उम्मीदवार अब इस नए पोर्टल विवाद को लेकर एक बार फिर राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और केंद्रीय चुनाव समिति का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में हैं। फिलहाल इस तकनीकी फेरबदल पर यूथ कांग्रेस के चुनाव अधिकारियों की ओर से कोई स्पष्टीकरण नहीं आया है, लेकिन 91वीं विधानसभा का यह मुद्दा प्रदेश की राजनीति में इस वक्त सबसे बड़ा हॉट टॉपिक बन चुका है।

